शब्दों से चोट लगती है

 

 

अक्सर
शब्दों से चोट लगती है
मन की गहराईओ तक जा पहुँचती है

एकाएक
दर्द भी दस्तक देता है
आँखों की मिट्टी
नम होने लगती है

अतीत की डोरी
इक सन्नाटा सा बुनती है

खुशनुमा लम्हओं के संदूक
खुलकर बिखरने लगते हैं

एक सुई
जो चुभी ही रह जाती है

अवचेतन में
बूंद बूंद रिसता
समृतिओ का लहु

जैसे एक निजी
‘आपतकालीन स्थिती ‘

जी हाँ
ऐसा ही कुछ अभास होता है
जब कुछ अपने
शब्दों से वार करते हैं

जी हाँ
शब्दों से भी चोट लगती है
और कुछ
रिशते भी राख होते हैं !!!

दो बेलगाम रूहें !

 

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फिर मौसम ने मिजाज़ बदला है

मैंने भी खोली है यादों की गठरी

हटाई हैं वक़्त की सिलवटें

फिर से गुदगुदाने लगे हैं

फुर्सत के वो लम्हे

 

याद आ रहा है

ज़िंदगी की जकड़न  से परे

उम्मीदों की थकन से परे

वो खोलना

बेतुकी बातों के संदूक

उधेड़ना बेसबब ही

किस्सों की गांठें

टहलना

ख्यालों की गलिओं में बेफिक्र

टटोलना

कुछ अधूरे सपने और

तोडना बंदिशों की लगाम

 

बनाना शरारतों की लिस्ट

और जोड़ना ज़िंदगी की गुल्लक में

बिन पैसे की खुशियाँ

सेकना इत्मीनान की गुनगुनी धूप

रिश्तों की नर्म घास पर

 

उकेरना एहसास की मखमली चादर पर

प्यार की कढ़ाई

और समेटना चिंगारियां

इश्क़ की आतिशबाज़ी की

 

आओ

के फिर से करनी हैं कुछ मनमर्ज़ियाँ

होना है फिर से बेपरवाह

क्योंकि शायद

मेरे दिल का पेट अभी नहीं भरा है

 

आजाओ के फिर से गुज़रें उन्ही राहों पर

इक मैं और एक तुम

जैसे कोई

दो बेलगाम रूहें !

 

 

 

 

 

 

रिश्तों को ढोना लाज़मी है क्या ?

सवाल बड़ा टेढ़ा है पर रह रह कर दिलो दिमाग के दरवाज़े पर दस्तक देता है!

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एक अदद ज़िन्दगी और बंधनों की लंबी फेहरिस्त ! वन पीस में हों तो क्या बात, दिल का चैनो सुकून बरकरार रहता है, और अगर नही तो फिर ढोते रहिए रूह के टुकड़े ताउम्र ! लेकिन क्यों ?

क्यों हम किसी बेजान और खोखले हो चले, उम्रदराज़ दरख्तों जैसे… रिश्तों को उम्र भर पालते रहते हैं? दर बदर, खानाबदोश होती संवेदनाओं का हिस्सा बने रहते हैं? वो जो, कभी अपने गंतव्य तक ही नही पहुँचती ।

रिश्तों के उधड़े कोनों को पैबंद लगाकर फिर से ओढ़ लेते हैं? क्यों बिन चीनी की चाय जैसे health conscious  होकर, रिश्तों के शुगर लेवल घाट जाने पर भी उसकी मिठास की अनुभूति का स्वांग रचते हैं ?

गन्ने के गूदे से भी बार बार रस निकलने का प्रयास करते रहना , थोड़ी और बूँदें जमा कर लेने की खातिर; निचुड़ी जा चुकी ज़िन्दगी के कुछ और अंश इकट्ठा करने जैसा ही तो है।

बाकी रिश्तों की लाज रखने के लिए उस एक रिश्ते का रोज़ सवेरा देखना, ज़िन्दगी की जद्दोजहद की धूप- छाओं समेटकर, ढलते सूरज के कटोरे में उसे उढ़ेल देना, फिर से एक दिन और उसे जीने के लिए।

जंग लगे संबंधों में ‘ कोशिशों’ की ग्रीज़ लगाकर उन्हें गतिशील रखना। और फिर ताउम्र रखना दर्द का हिसाब, दिल के बहीखातों में, और उफ़ भी नही करना। यही तो करते हैं अक्सर! क्योंकि तोड़ने के  गुर हमें सिखाए नही जाते, और यूँ भी जिम्मेवारियों की गांठे खोलना और उठती उंगलियों को नज़रअंदाज़ करना कब इतना आसान था ?  लोग क्या कहेंगे से लेकर मेरा क्या होगा  तक का सफर तो हम किश्तों में सारी उम्र काटते हैं ।डरते हैं, बिखेरने से और बिखर जाने से , क्योंकि शायद हमें नही सिखाया जाता खुद के लिए जीना, नही सिखाया जाता अपनी अंतर आत्मा की आवाज़ को सुनना। वैसे भी आत्मकेंद्रित होना किसी गुनाह से कम भी तो नही! हाँ लेकिन फिर आप सपने तो देख ही सकते हैं।

उसके…. जो अधूरा और नामुमकिन  सा है!

सपने अपनी शर्तों पर जीने के! ख्यालों की आज़ादी के उस खुशनुमा जज़्बे की पतंग बनाकर खुले आसमान में लहराने के, इश्क़ की आतिशबाज़ी के, बंदिशों से परे अपनी ज़िन्दगी की लगाम अपने हाथों में लेने के!

लेकिन सपनों को हकीकत बनाने की मशक्कत बड़ी कीमत मांगती है।  बंधनों के धागे काट कर आज़ाद होने के या फिर उन धागों को कहीं और जोड़ने  के लिए दिलो दिमाग की ताक़त चाहिए होती है। ये ताक़त और हिम्मत बाज़ारी कमोडिटी के माफिक किसी पैकेजिंग में उपलब्ध नही होती, न ही सड़क पर चलते चलते यूँही कोई किसी विज्ञापन के पैम्फलेट की तरहं हाथों में इसे थम कर चला जाएगा।

कीमत अदा कीजिए या फिर ढोते रहिए रिश्तों को उनकी आखिरी सांस तक।

चॉइस इस योर्स !

पलाश के फूल

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खुश्क बाशिंदों के शहर में

मखमली स्पर्श का एहसास

जाड़े की उदासीनता 

को अलविदा कहते

बसंत के संदेशवाहक

ये सुर्ख लाल

पलाश के फूल

  

घने देवदारों की ओट में

जैसे कहीं कोई शरणार्थी

 

अपनी शाखों से बिछड़ कर

उदास काली सडकों पर

बिखरे हुए….

एकाकी और आनंदित !

 

मेरी

स्मृतियों से सराबोर

बसंत के संदेशवाहक

ये सुर्ख लाल

पलाश के फूल !

 

 

 

 

 

पत्नियों का वैलेंटाइन

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गुलाब के फूल , चॉकलेट्स, टेडी बीयर्स ,एक प्यार भरा तोहफा और एक शानदार ‘डेट’ !

प्रेम के गहरे समुन्दर में  गोते लगाता,ये सालाना महोबत्त का त्यौहार’ एक बार फिर अपने अस्तित्व का प्रमाण देता हुआ , भावनाओं की अपेक्षा, पैसे की चमक में अधिक टिमटिमाता नज़र आ रहा है ।  कनसयुमरिज़म ‘ और इश्क़ के जज़्बे का कॉकटेल । जनाब इसका नशा सर चढ़कर बोलता है ।

क्या बजने लगी घंटियां आपके दिल में भी ?

वैसे यही कुछ चीज़ें हैं न जो वैलेंटाइन को ख़ास बनाती हैं ।अब प्यार तो इन्ही सब बाज़ारी चीज़ों में झलकता है, भले ही महबूब की आँखों में इसकी डेफिशिएंसी ‘ क्यों न हो, ये दिन फीका सा रह जाए अगर कोई ‘सरप्राइज’ न मिले. अब  देखिए ! रिलेशनशिप मेंटेनन्स  के लिए ये लाज़मी भी तो है ।

 

खैर महबूब से याद आया ….आपका भी तो कोई महबूब रहा होगाकोई बॉयफ्रेंड या वो एक ख़ास शख्स । अरे! क्या हुआ अगर आप भी मेरी तरहं शादी शुदा हैं ?

वैलेंटाइन तो मना ही सकते हैं  या फिर आपकी स्तिथि भी उन ‘ गर्लफ्रेंड टर्न्ड पत्नियों ‘ जैसी है जिन्हें शादी के बाद वो ‘इज़हारे महोबत्त’ नसीब ही न हुआ या फिर पहले वाली तत्परता और एहसास बीवी होने की वास्तविकता में ऐसा गायब हुआ जैसे किसी वाशिंग पाउडर के विज्ञापन में मैली सफ़ेद कमीज से, गहरे दाग झट से गायब हो जाया करते हैं !

या फिर शादी के कुछ साल बाद वैलेंटाइन डे, जवानी की खुशनुमा यादों का बस एक हिस्सा बनकर ही रह गया है ? या किसी पुरानी किताब में संजोए गुलाब जैसा हो गया है, जो कभी मिल जाए तो उस गुज़रे वक़्त की यादें ताज़ा कर चेहरे पर एक लंबी मुस्कान छोड़ जाता है ।

अब बॉयफ्रेंड और पति में कुछ तो अंतर रहता ही है ।

ये वैलेंटाइन डे , रोज़ डे, चॉकलेट डे, टेडी बेयर डे, हग डे, प्रोपोज़ डे……. ये सब तो शादी के पहले के चोंचले  हैं . शादी के बाद तो सिर्फ चाय दे, कॉफ़ी दे, खाना दे , कपडे दे, कम्बल दे और सोने दे !

जनाब ! प्रेमी की….. पति पद पर प्रमोशन क्या हो जाती है ,प्यार के रिमाइंडर की ज़िम्मेदारी काफी हद्द तक हमारे ही सर आ पड़ती है ।

शादी के बाद कुछ समय में ये प्यार का डिस्प्ले और वैलेंटाइन का इंतज़ार मिस्टर इंडिया के अनिल कपूर  जैसा बीच बीच में  गायब क्यों होने लगता है ? अब हम कैसे कहें के “मोगैम्बो खुश हुआ” !

पतियों की स्टेटमेंट्स कुछ यूँ भी हुआ करती हैं …..

“अपने जन्मदिन, शादी की सालगिरह , बच्चों के जन्मदिन, बाकी और ख़ास दिन…. अब क्या क्या मनाइगा?

और फिर वैलेंटाइन कोई दिवाली, होली, संक्रांत  या करवाचौथ तो नही  जिसके तय रीती रिवाज़ हुआ करते हैं” ।

जी बिलकुल ! लेकिन ऐसी टिपिकल सी सोच के कारण भी तो हुआ करते हैं ।

नोकीले दांतों वाली शार्क मछली की तरहं प्यार को चबा कर निगल जाने वाली ये ज़िम्मेदारियाँ हैं, या फिर एक पुरुष की ( जो पति बन गया है )…. मूल मानसिकता ही ऐसी होती है ? प्यार के पौधे को लगाकर उसे नियमित रूप से पानी देना भूल जाते हैं और हमारी आस है की टूटी फूटी ही सही पर ज़िंदा रहती है ।

उस गुदगुदाते, उफनते प्यार की चाशनी तो ओवरहीटिंग से , ज़िन्दगी की जद्दोजेहद में , कैरामलाइज़ होकर सतह पर जमी ही रह जाती है ।

तो ऐसे में हनी, स्वीटी, चोकपाई, स्वीटहार्ट, जानू, लडू…….ये सब भूतकाल का हिस्सा बन जाते हैं ।

अजी वैलेंटाइन डे का ज़ायका चखे ज़माना हुआ । अब तो बस इसके एहसास की खुशबू से दिल बहला लेते हैं ।

हाँ मानती हूँ कुछ पति अपनी पत्नियों का बहुत अच्छे से ख्याल रखते हैं और वैलेंटाइन ही नहीँ , सालभर इसे मानते हैं । पर बहुत सी ऐसी पत्नियां हैं जो उस प्रेम की अपेक्षा में अपना दिल मसोस कर रह जाती होंगी ।

सोचती हूँ …पत्नियों का वैलेंटाइन गर्लफ्रेंड होने की तुलना में हल्का क्यों पड़ जाता है ? जीवन संगिनी के लिए वही एक्ससाईटमेंट क्यों नहीँ ?

यूँ तो कहते हैं प्यार नुमाइश की चीज़ नहीँ पर उसका बयान बहुत हद्द तक ज़रूरी भी तो है । मानती हूँ प्यार औपचारिकता का गुलाम नही, कार्ड्स,फूल, चॉकलेट और गिफ्ट्स से इसकी महत्ता आंकी नही जा सकती । लेकिन शब्दों के सहारे या तोहफों की मदद से, रोज़मर्रा में या वैलेंटाइन की शाम ..इसे यादगार तो बनाया ही जा सकता है ।

 

 

 

 

 

मेरा संडे कभी आया ही नहीं

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संडे मतलब छुट्टी !

संडे मतलब काम पर ना जाने की आज़ादी। संडे मतलब सुबह देर तक सोने का मौका। हफ्ते में एक दिन का ‘कनफर्म्ड’ सुकून।

पर किसके लिए ?

मेरे पतिदेव के लिए और खासतौर पर मेरी दो बेटियों के लिए। बाकी रही मेरी बात तो शादी को चौदह साल हुए… लेकिन मेरा संडे कभी आया ही नहीँ। ये खट्टी मीठी टॉफ़ी जैसा संडे… दो- तीन घंटों की एक्स्ट्रा नींद के ‘बोनस ‘ का ऑफर लिए आ जाता है हर हफ्ते । जैसे कोई एहसान, कोई मेहरबानी करता हो मुझ पर।

जैसे किसी प्रतिस्पर्धा में मिलने वाला ‘ सांत्वना ‘ पुरस्कार। भागती- दौड़ती ज़िन्दगी में एक छोटी सी सांत्वना। कैलेंडर की कुछ ख़ास तारीखों के इलावा मेरे हिस्से का साप्ताहिक अव्कांश ।

गृहणी होना सीमा पर तैनात सैनिकों की तरह होना ही तो है । निरन्तर चौकस और ड्यूटी देने जैसा। दिन की ‘अनिवार्य लिस्ट’ से किसी भी काम पर अंकुश नहीँ लगाया जा सकता भले ही उसे डिले क्यों न कर दिया जाए।

जैसे सबकी होती है, मेरी भी एक पत्नी और माँ होने के नाते एक बंधी सी ‘ दिनचर्या ‘ है। संडे के दिन  घर में सब आराम से सो कर उठते हैं। दिन के बाकी काम देर से करें या ना भी करें , देर से खाएं, या देर से नहाएं, मेरे काम में ‘डिडक्शन’ की गुंजाईश नहीँ रहती । इन्क्रीमेंट का लिफाफा हमेशा रेडी रहता है। यानी मेरी  दिनचर्या वैसे ही मुकम्मल रहती है। वैसे….. क्या कभी देखा है उत्तरी ध्रुव के ग्लेशिरों को पिघलते हुए ?

खैर छोड़िये !

लेकिन जैसे बाकी सबकी दिनचर्या संडे को चैन की सांस लेती है, मेरी अकड़ कर सर पर सवार हो जाती है। मुझसे वही सब काम करवाती है जो मैं आमतौर पर हर रोज़ करती हूँ। निहायती ज़िद्दी और चिपकू सी है ।मेरी एक नहीँ सुनती। अपने काम का आर्डर भले ही बदल लेती ही लेकिन कभी ख़तम ही नहीँ होती ।

मेरे दिमाग में स्थाई रूप से सेट एक अलार्म की तरह। ना भी चाहूँ तो मेरे दिमाग की घंटी बजाकर बोल पड़ती है,  “तो क्या हुआ आज अगर संडे है? उठना तो होगा। सुबह की चाय बनानी है , दूध से मलाई भी तुम्हे निकालनी है, दही भी तो तुम्ही जमाओगी, नाश्ता तो तुम्हे ही बनाना है , परोसना भी है ,बच्चों को तैयार भी करना है, उनके होमवर्क और स्कूल प्रोजेक्ट्स भी तुम्हे ही देखने हैं, अरे ! कल डिक्टेशन है…वो भी तो तुम ही करवाओगी। दोपहर को भोजन भी तैयार करना है, रात का खाना भले बाहर होगा। किन्तु अगले दिन टिफ़िन में क्या देना है…इस दुविधा से छुटकारा थोड़े ही मिल जाएगा। सोने से पहले स्कूल यूनिफॉर्म भी निकालकर  रखनी है। रसोई में सुबह की थोड़ी बहुत तैयारी भी करनी होगी। हाँ, वैसे पति भी ‘वन्स इन आ वाईल ‘ वाला सपोर्टिंग रोले प्ले करेंगे। बहरहाल इन सब के बीच में थोड़ा समय तुम्हे बाहर और घर के पेंडिंग कामों के लिए मिल ही जाएगा ” ।

बड़ी क्रूर है मेरी ये दिन भर की अनिवार्य लिस्ट। छह बजे के अलार्म के ना बजने के इलावा संडे को भी सब कुछ , अक्सर वैसा ही घटित होता है। बस दिन की रफ़्तार कुछ और धीमी हो जाती है, ज़िन्दगी  थकी सी  …..थोड़ा और सुस्ता लेती है।

भई!  किसी दिन कहीं गायब हो जाए या लंबी नींद सो जाए , कुछ दिन कोमा में ही  चली जाए। कम्बखत ! किसी ज़ालिम सास की तरह है। मुझे कभी समझती ही नहीँ।  मुझे भी तो हफ्ते भर की जद्दोजहद के बाद एक छुट्टी का अधिकार है। कभी मैं भी सोचती हूँ…….मुझे सुबह उठना ही ना पड़े। रसोई में मेरी एंट्री प्रोभिटेड हो। मुझे भी बिस्तर पर कोई सुबह की लाज़मी चाय सर्व कर दे, नाश्ते का झंझट ही ना हो. बच्चे खुद ब खुद अपने सारे काम कर लें, और अगले दिन की चिंता ना हो । मुझे भी सही मायनों में अवकाश मिले । हाँ साल में एक दो  ‘ हॉलीडेज़ ‘ ऐसी किसी मंशा के नज़दीक से होकर  गुज़रते ज़रूर हैं….हल्का फुल्का एहसास , लेकिन माँ और बीवी होने की मूल जिम्मेदारी के साथ । कुछ ऐसे …..जैसे चिरापुंजी की बेलगाम बारिश में कभी कभार निकलने वाली सुनहरी धूप.

मैं भी कहाँ पहुँच गई …..

बस ज़रा इस खूबसूरत ख्याल के हवाई किले क्या बनाए मैंने….झट से एक और काम याद आ जाता है, किसी कमरे से एक आवाज़ आ जाती है, एक और फरमाइश, एक और फ़र्ज़ और गुज़र जाती है एक और छुट्टी इसी हसरत में। ऐसा ही तो होता है अक्सर। अब  ये ज़िद्दी और चिपकू दिनचर्या नियति सी बन गई है । हंसिए या रोइए, संडे है तो मंडे और ट्यूजडे जैसा  ही। ज़िन्दगी डिस्काउंट देती है पर अपनी शर्तों पर।

किसी की अर्धांगिनी होने का सुख, किसी की माँ होने का गौरव , और इन सब के बीच एक औरत होने की दुविधा और एक  व्यक्ति विशिष्ट होते हुए एक दिन के आराम की अपेक्षा। कुछ ज़्यादा मांग लिए क्या ज़िन्दगी से मैंने ? अरे! गलत मत समझिये। मैं कोई पीड़ित नहीँ और ना ही फेमिनिस्ट होने की तमन्ना रखती हूँ। अपने दायरे में रहते हुए बस एक छोटी सी ख्वाहिश है जो उड़ान भर्ती तो है पर उसे वास्तविकता की ज़मीन पर आकर लैंडिंग करनी ही पड़ती है।

देखिए…..क्या पता शायद मेरा संडे भी कभी आ जाए !

 

कुछ रिश्ते……

 

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कुछ रिश्ते

महँगी ब्रांडेड इत्रजैसे होते हैं

जिन्हें कयोंकि…

हासिल करना मुश्किल होता है

इसलिए

मात्र  ‘टेस्टर ‘ की महक से ही दिल बहला लिया जाता है

 

कुछ रिश्ते

बौद्ध भिक्षुओं के मन्त्रों की तरह होते हैं

जितनी बार सुना जाए

हर बार सुकून का ही एहसास होता है

 

कुछ रिश्ते

सुबह की लाज़मी चाय की प्याली जैसे होते हैं

जिनके बिना …

दिन की शुरुआत ही नही होती

 

 

कुछ माँ के हाथ के बने

स्वेटर जैसे….

गर्माहट से भरे

 

कुछ

कांच के गिलास के सेट जैसे

जिन पर अक्सर हैंडल विद केयर का लेबल लगा रहता है

 

कुछ उत्तरी ध्रुव् के ग्लेशियरों  जैसे

बेहद ठन्डे

कभी पिघलते ही नही

 

कुछ

प्रवासी पक्षियों जैसे

साल के दो – चार महीने

अपना स्थाई पता बदलकर

फिर अपने वतन लौट जाते हैं

 

कुछ पहाड़ों पर बनी

संकरी पगडंडियों जैसे

जिन्हें हमेशा संभल कर पार करना होता है

 

 कुछ रिश्ते ‘बहीखातों ‘जैसे होते हैं

जिनके हर लेन – देन का हिसाब रखा जाता है

 

कुछ रिश्ते

किसी पुरानी नोटबुक में संजोए

 गुलाब के फूल जैसे होते हैं

सालों बाद भी मिल जाएं

तो चेहरे पर लंबी मुस्कान छोड़ जाते हैं

 

और कुछ रिश्ते…

लापता ‘ऍम .एच . 370′ जैसे भी होते हैं

जिनकी तलाश

कभी ख़त्म ही नही होती !