मेरे हाथों में तिरंगा रहने दो !

 

 

 

flag 1

महज़ कपडे का टुकड़ा नहीं है
ये मेरी- तुम्हारी पहचान है
तीन रंगों में उन्मुक्त होकर
लहराता लोकतंत्र है !

लेकिन जब तुम कर डालते हो
इसके हिस्से
और समझाने लगते हो
लाल और हरे के बीच का फर्क
भूलकर
उस सफ़ेद रंग की अहमियत
तब तुम कर डालते हो
इसकी अस्मिता के महीन चिथड़े !

भूल जाते हो
ये मेरा – तुम्हारा सम्मान है
ये मेरा तुम्हारा स्वाभिमान है

इन रंगों को जैसा है
वैसा ही रहने दो
मेरे हाथों में बस तिरंगा रहने दो !

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ये सड़क तुम्हारी जागीर है क्या ?

road 2

सुना था सड़क किसी की मिलकियत नहीं होती । ये मेरी- तुम्हारी और हर उस पैदल या गाडी लेकर चलने वाले की होती है । और ये भी सुना था के रात में सड़कें खुशनुमा होती हैं । शांत और शालीन ! दिन भर के शोरगुल से परे, सन्नाटे की ओट में एकाकी और जैसे के खुद से बतियाती हों ।

लेकिन आजकल ये सड़कें बदचलन और बेशर्म हो गई हैं ।

आज़ाद, अल्हड़ , बेपरवाह और बेख़ौफ़ होकर कहीं भी निकल जाए, अब ऐसा कम ही होता है , क्योंकि एक अरसे  से बदनाम हैं इस देश की सड़कें ।

बदनाम हैं मेरे शहर की सड़कें, बदनाम हैं दिल्ली की सड़कें जहाँ रात को निकलने पर बन जाती है निर्भया नाम की एक भयावह कहानी। बदनाम हैं बैंगलोर की सड़कें जहाँ देर रात कोई किसी लड़की को उसके घर के बाहर छेड़ने की हिम्मत रखता है , बदनाम हैं चंडीगढ़ की सड़कें  जहाँ आप देर रात पार्टी के बाद सड़क पर अकेले गाडी चला कर आएं तो कुछ सिरफिरे लड़कों को लाइसेंस मिल जाता है  किसी वनिका का पीछा करने का, ताकि वे कर सके आपको जी भर के  प्रताड़ित । बदनाम है मुंबई और कोलकत्ता की सड़कें जहाँ बीच रात में , मदद के नाम पर गाडी में दबोचकर आनंद लिया जाता है किसी सुज़ैट जॉर्डन के जिस्म का । बदनाम हैं लखनऊ की सड़कें जहाँ एक लड़की जो घर से निकलती है पढ़ने के लिए, लेकिन  उसे कुछ मनचले उठा ले जाते हैं और नोच खाते हैं उसके जिस्म को किसी भूखे गिद्ध की तरह। बदनाम है मेरठ और मुज़फ्फरनगर की सड़कें जहाँ  किसी माँ और बेटी का उसके पति और पिता के समक्ष ही कर लिया जाता है चीरहरण।

और अब बेहद बदनाम हैं इस देश के कोने कोने में , छोटे कस्बों और गाँवों में , वहां की सड़कें, जहाँ अब शायद कोई महिला खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करती क्योंकि अब हवस का जूनून सर चढ़कर बोलने लगा है । तीन, पांच, दस, बीस, पच्चीस, पचास या अस्सी, अब उम्र का लिहाज़ कहाँ होता है ? ये तो बस कुछ उदहारण भर हैं क्योंकि ऐसे किस्सों की गिनती कर पाना मुश्किल है,  जुर्म जितने संगीन, आंकड़े उतने ही भयानक !

लेकिन यही सड़कें तुम्हे डराती नहीं ।  हाँ, क्योंकि कोई तुम्हे जंगली जानवरों की तरह घेरकर तुम्हारी बोटियाँ नहीं नोचता , तुम्हारे शरीर से नहीं खेलता, तुम पर अपनी आँखें गढ़ाकर , ऊपर से नीचे तक तुम्हारी काया का एक्स – रे जो नहीं करता ।

तुम नहीं बदलाव ला सकते अपनी संक्रमित मानसिकता में , इसीलिए मेरे हिस्से ही आती हैं सड़ी गली हिदायतें!

के अकेले नहीं चलो , किसी पुरुष के साथ चलो!  एक पुरुष तुम्हारा ‘सुरक्षा कवच’ है जबकि वही पुरुष भक्षक भी है। के चलो तो घडी की सुईओं का जायज़ा लेकर , और हो सके तो घर से ही मत निकलो !

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हाँ, शायद मुझे देर रात सड़कों पर बाहर नहीं निकलना चाहिए , दिन ढलते ही घर की चार दीवारी में कैद हो जाना चाहिए क्योंकि मेरे निर्बल देह और उससे जुडी मेरी अस्मिता इसी बात पर तो निर्भर करती है ! हाँ मुझे देर रात गाडी चला कर घर नहीं लौटना चाहिए , ऑटो या बस नहीं लेनी चाहिए , काम से रात में अकेले घर नहीं लौटना चाहिए।

मुझे बस डर कर रहना चाहिए क्योंकि मैं एक औरत हूँ और तुम एक पुरुष, ये बुनयादी फर्क मुझे नहीं भूलना चाहिए । क्योंकि तुम पुरुष हो और तुम्हारे अधिकारों की कोई सीमा नहीं इसलिए नसीहतों की लम्बी लिस्ट सिर्फ मेरे लिए !

मेरा विद्रोह, मेरा आक्रोश, मेरा उन्मुक्त और बेपरवाह होना तुम्हे खलता है ।

हाँ पता है मुझे के तुम और तुम्हारी व्यवस्था नपुंसक हो चुकी है , निरर्थक और निष्कृय! पुलिस स्टेशन के रेजिस्ट्ररर्स में जमा होती कुछ एफ. आई. आर्स, अखबारों के पहले पन्ने की सुर्खियों, कुछ आन्दोलनों और कोर्ट की
तारीखों के इलावा कुछ नया नहीं घटता    ।

लेकिन फिर भी मैं डर कर नहीं जिऊँगी, मैं शर्म से सर नहीं झुकाऊँगी।तुम मेरे हौसले नहीं तोड़ पाओगे , मैं गिरकर भी उठूंगी , जख्म खाकर भी चलूंगी ,  क्योंकि ये रात मेरी भी उतनी है जितनी की तुम्हारी।

होगा  तुम्हे अपने पुरुष होना का खोखला अहम्

पर सड़कों पर तुम्हारा वर्चस्व नहीं!

ये सड़क तुम्हारी जागीर नहीं !

मेरा दिल एक mixer grinder !

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लीजिए चल दिया ये साल भी !
जैसे पुराने यार को छोड़ हुआ जा रहा हो बेक़रार सा , बाहें थामने किसी नए हमसफ़र की । जाने क्या समाया है उसकी आगोश में। अंजान और बेखबर, लेकिन बिन पैराशूट, उम्मीदों की उड़ान फिर भी पुरज़ोर! !
यूँ भी, 365 दिन शायद कम नहीं होते । हर बार ज़िंदगी का चक्र घूमता है, कितना कुछ दे जाता है हमें, जिसके अक्सर हम शुक्र गुज़ार भी नहीं होते और कितना ही कुछ ले भी जाता है, के जिसका अफ़सोस हम करते नहीं थकते।

कितना कुछ है जो हम सोख लेते हैं, आत्मसात करते हैं!
कैलेंडर के साथ वक़्त भी बदल जाए , ये उम्मीद रखना गुनाह भी तो नहीं।
पर अक्सर बस साल ही बदलते हैं, हम और हालात कुछ एक से।
नई तारीखें लेकिन उम्मीद वही, जैसे चुन लेना अपने हिस्से के आसमान में टिमटिमाते तारों में से कोई एक नया तारा । जैसे के करना चीरापुंजी की बेलगाम बारिश के बाद सुनहरी धूप का इंतज़ार !

नया दिन और एक नई तारीख, सचमुच कुछ ख़ास होता है क्या ?
मेरे अंदर तो वही सब घटता है, साल बदल भी जाए तो क्या?
बस एहसासों का ग्राफ कुछ ऊपर नीचे होता है, दिन , महीने साल बदलने से अंदर होने वाली इमोशनल उठा- पटक, लगभग ज्यों की त्यों !
अंतर द्वंद के भी लगभग वही ‘tantrums’
मेरा दिल वैसे ही धड़कता है , सोचता है, महसूस भी करता है। कितने ही ख्यालों के बुलबुले हर रोज़ उठते हैं और शाम होते होते , मजबूरी और असंभव जैसे ज़ालिम शब्दों की उफनती नदी में सहसा ही विलीन भी हो जाते हैं ।
ये तरसता भी है, तड़पता है और बिलखता भी है , उसके लिए जो था और अब नहीं है, वो जो रेत की मानिंद हाथों से फिसल गया, या फिर उसके लिए जो हासिल ही न हुआ ।
यादों की गठरी बनाता और खोलता है , मुस्कुराते लम्हों को हर पल कैद रखता है अपनी गहराईओं में और उसी शिद्दत से संभाले रखता है अपने किसी कोने में दर्द की तासीर।
मेरा दिल तारीखें भी बखूबी याद रखता है और इसी दिल के बहीखातों में हिसाब होता है प्यार के लेन देन का और उन लाज़मी गिले- शिकवों का भी । ये अपनों से रूठता है और भरता है दर्द के कटोरे । रिश्तों के नमक को स्वादानुसार बनाए रखने की कश्मकश भी जारी रखता है ।
तड़पता भी है फिर से वहां लौट जाने के लिए जहाँ रूह को सुकून मिलता है । अपने शहर की याद में गुमसुम भी हो जाया करता है । कुछ हद तक जीने के लिए फिर से वो गुज़रे लम्हे । फिर से पहाड़ों पर जाकर बस जाने के लिए , ऊँचें – नीचे रास्तों की थकान को फिर से चखने के लिए! फिर से बचपन की किसी शरारत को दोहराने का मौका भी ढूंढ़ता है, वो मेरे अंदर का बच्चा जो किसी मंज़िल की तलाश में नहीं भटकता था , वो जो अब कहीं खो सा गया है ।
ये ख्वाहिशों की लम्बी लिस्ट की, महीने के बजट की तरहं अक्सर एडजस्टमेंट भी करता है। और फिर खुद से भी तो बहुत उमीदें लगाए रहता है, अपने आस पास की चीज़ों को बेहतर से बेहतरीन बनाने की जद्दोजहद में रुस्वाई और आत्म ग्लानि से जूझता भी है ।
बहलने के लिए शायरी की dose लेता है , बेगम अख्तर की ग़ज़लें भी गुनगुनाता है । कुछ देर के लिए ही सही, मेरे दिल की सख्त मिटटी जैसे पहली बारिश की नमी समान महक सी उठती है । जैसे ज़िंदगी के मसलों से कुछ देर की निजाद । जैसे तपती गर्मी वाली दोपहर में ठन्डे शरबत का मज़ा !
दुनिया की, समाज की मुश्किलों से दो चार भी होता है। थोड़ा ठहर कर सोचता भी है, नसों में दौड़ता गर्म खून कुछ देर उबलता भी है फिर और क्या…बस नज़रअंदाज़ कर देता है! अपनी सहूलियत की खातिर ही सही, खुद को माफ़ भी कर देता है ।
हर बार ‘वक़्त’ से थोड़े और वक़्त की गुज़ारिश भी करता है, होने के लिए खुद से मुखातिब , करने के लिए स्वयं से वार्तालाप !
कायदों को तोड़ता भी है , बंदिशों की लगाम को ढील देता है , और मनमर्ज़ियाँ भी करता है,
उछलता भी है, गिरता है और संभलता भी है !
वही आग, वही तपिश, चिंगारियां भी वही , पागलपन भी वही , प्यास भी वही !
सब एक साथ सुलगता है , घुलता है, टकराता है! आए दिन यही दिल हसरतों के महीन टुकड़े भी करता है ,
फिर किसी नई उमंग के मीठे रस से उमीदों का घोल बनाता है,
शिकायतों और महोब्बतों का खट्टा मीठा पेस्ट ,
‘थोड़ा है और थोड़े की ज़रुरत है’ के बीच का सफर तय करता हुआ हर पल जाने अनजाने खुद को निचोड़ता भी है , साल दर साल कुछ ऐसा , कुछ वैसा …यही तो करता आया है ! सब कुछ तो कर लेता है ये दिल ! तो फिर तारीखों के इस पार या उस पार क्या ? साल बदले भी तो क्या ?
आपका तो नहीं मालूम
लेकिन
मेरा दिल बन गया है जैसे कोई मिक्सर ग्राइंडर !

मूकदर्शक !

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                                                                             ( I )

उसे ज़िंदा जला दिया

उद्घोषणा के साथ

के नहीं होने दूंगा

लव जिहाद

आक्रोश, द्वेष, प्रतिशोध,और प्रतिकार

किसी ज्वलंत ज्वालामुखी के समान

निरंतर उगलते रहे

अपना लावा

 

उँगलियाँ थमी

जबान

और

पछतावा, पीड़ा, ग्लानि

इनका आधापौना अंश भी

उन  आँखों में मौजूद नहीं था

 

शायद

बेहद ज़रूरी था

उसकेदेह को प्रचंड अग्नि के हवाले कर

सिखाना उसेसबक

के किस हक़ से पार की तुमने

वो मानव रचित

धार्मिक लक्ष्मण रेखा

और इसीलिए

दे  दी गई उसकी

धार्मिक बलि‘ !

 

क्योंकि

उस कौमके लोगों को

नहीं अधिकार

के वो देखें नज़र भर के हमें

 

ज़रूरी थाउन्हेंदिखाना

अपने धर्मकी ताकत

बजाना अपने वर्चस्व का बिगुल

और करना

दहशत के गलियारों में

खुद को बेहतर साबित !

 

(II)

न्यायसंगत है

उसकीप्रतिष्ठा की खातिर

उठा लेना तलवार, चाकू या कटार !

देना गाली, धमकी

या जारी कर देना कोई फरमान

 

 

ये हैं

स्वः नियुक्त

धर्म के संगरक्षक

इनके अपने ही नियम, सिद्धांत

और जैसे के बना लिया हो

अपना एकनिजी  संविधान‘ !

 

दिन दुगनी होती

बेलगाम कट्टर फ़ौज

क्रोध और प्रतिशोध से लैस

अब आप बेझिझक कह सकते हैं

हमारे पास भी है

अपना एकतालिबान‘ !

 

और यूँ भी

डर में बड़ी ताकत होती है जनाब

इसीलिए

हमारी नसों में दौड़ता खून

अब नहीं खौलता

 

इसीलिए

आप बस देखिए, पढ़िए

थोड़ा चिंतन कीजिए

और अंततः

आँखें फेर लीजिए

क्योंकि

आप इसके जिम्मेवार नहीं

ये आपके साथ नहीं हो रहा

आप बने रह सकते हैं

हमेशा की तरह

एक मूकदर्शक !

मैं उसे पत्थरों में नहीं ढूंढ़ती !

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राम , कृष्ण, शिव, गौतम बुध , यीशु , अल्लाह, नानक , ब्रह्मा, विष्णु , साईं , पीर , पैगम्बर, गुरु , मुनि ! एक परमेश्वर के न जाने कितने ही रूप ।

तुम उसे  जाने कितने नामों से पुकारते हो, उसके अस्तित्व का सिमरन करते हो, उसके नाम की माला जपते हो।

उसे तराशे हुए संगमरमर  में कैद करते हो और सर झुकाते हो उसी पत्थर की बनाई आकर्षक शिलाओं के समक्ष। आराधना करते हो उसके काल्पनिक , सुवर्ण रंगीन चित्रों की और बांटते हो उसे भाषा, जाति, और प्रांतों में। उसे रिझाने का अथक प्रयास करते हो पद्धतिबध धार्मिक कार्यकलापों से, औपचारिक कर्मकांड, शास्त्रविधि और जटिल अनुष्ठानों से। कैद करते हो उसे रूढ़िगत परम्परों में, जोड़ते हो निर्जीव और निरर्थक हो चुकी प्रथाओं से। गुणगान करते हो उसका ग्रंथों, किताबों , लोक कथाओं में, गीतों में, किस्से कहानियों में। उसे मानव संस्थानों में सिमित करते हो और फिर उसके लिए बनाए पूजा स्थलों को लेकर परस्पर प्रतियोगिताओं का सिलसिला जारी रखते हो महज़ अपनी आन, बान और शान की खातिर ।

भौतिक सुख- सुविधाओं की अप्रतिम अपेक्षा में, जीवन की तृष्णा में, और अपने अनगिनत स्वार्थों में बखूबी इस्तेमाल करते हो उसका, क्योंकि तुम उस परमात्मा में  ढूँढ़ते हो अपने डर का substitute। अक्सर अपने अच्छे बुरे कर्मों की settlement के लिए आए दिन  उसके दर पर नतमस्तक हो जाते हो। उसे impress करने के लिए खुद को कष्ट देते हो।  रिश्वत देते हो सोने के मुकुट बनवाकर, दूध, फल, मिठाई, और छप्पन भोग से और फिर  स्वयं को अति भाग्यशाली महसूस करते हो। उसे भी आखिरकार सिक्कों की खनक में ही तोलते हो, उसके नाम की भी बोली लगाते  हो, जेबें हल्की कर, ‘VIP  पास’ जैसी आधुनिक सुवधाओं का लाभ लेकर  उससे personal  appointment फिक्स करते हो।

उसकी चाटुकारिता में कोई कसर नहीं छोड़ते।  हर वो कोशिश,  हर एक उपाय, वो प्रार्थना, वो लालसा, वो साल में दो बार नौ दिनों तक खुद को भूखा रखना, कायदे से रोज़े रखना, किसी गुरूद्वारे में चालीस दिनों की हाज़री का नियम तो हफ्ते का कोई एक दिन चुन कर उसके ही नाम की इबादत में अन्न- जल का त्याग, गणेश चतुर्थी, जन्माष्टमी, ईद , रमादान,  शिवरात्रि, दुर्गा पूजा, ओणम, सक्रान्त, महोरम, क्रिसमस पर दिखावों की एक लम्बी लिस्ट पर ऐसे किसी भी पर्व का असली सन्देश और मकसद हर बार नदारद!

परमात्मा की उपासना से कहीं ज़्यादा भक्ति और निष्ठा का  स्वांग। Consumerism का जैसे कोई सालाना मेला!

मानवीय संवेदनाओं और एक दूसरे के प्रति प्रेम की मूल भावना से परे  अपने निजी स्वार्थ की खातिर इस स्वांग को जारी रखते हो। ज्ञान और तर्कसंगत सोच को विकलांग बनाती धार्मिकता की overdose ही तो है, ताकि भावी पीढ़ियां अनुसरण  करती रहें इस धार्मिक खेले  का  । ताकि तुम्हारी  सदियों पुरानी सुचारु रूप से चलती आई  ‘धार्मिक अर्थव्यवस्था’ की बुनियाद कहीं चरमरा न जाए!

पर क्या ईंट – सीमेंट और पत्थरों की चार दीवारी की परिक्रमा से पाप काट जाते हैं ? दिल खोल कर मंदिर की दान पेटी में नोटों का अम्बार लगा देने से, ईश्वर की बनाई  स्वरचित मूर्तिओं पर सोने चांदी के मूल्यवान आभूषणों के दान से, कठिन व्रत और अनुष्ठान से, उसकी उपासना में कई सौ सीढ़ियां चढ़ जाने से या दरगाह पर सुनहरी, गोटे वाली चादर चढाने से क्या उस खुदा पर ज़्यादा असर होता है ? उसे प्रलोभन देने से वो तुम पर अपनी दयादृष्टि बने रखता है? क्या   priority basis पर तुम्हारी अप्लीकेशन पर ग़ौर करता है ? क्या उसे सचमुच इस तरहं impress किया जा सकता है ?

मुट्ठी भर लोगों को छोड़ भी दें तो, उसे याद करना अपनी बेतहाशा ख्वाहिशों की दरख्वास्त भर से ज़्यादा बस कुछ और नहीं!

उसकी असली आराधना यानी उससे जुड़ना,

उससे संवाद यानी उससे अपने दिल की बात कहना,

उससे  आत्मिक सम्बन्ध यानि कहीं न कहीं खुद को तलाशना,

उससे करना  सांझा अपना हर ज़ख्म, हर दर्द, दिल पर लगी हर चोट,

हर लम्हा मुस्कराहट का, सफलता और उपलब्धि का, और जाने अन्जाने बना लेना उसे अपना हमसफ़र, हमराज़ और एक दोस्त!

पर दोस्त की उपासना तो नहीं की जाती, उससे  डरा भी नहीं जाता , उसके आगे सर भी नहीं झुकाते, उसे रिझाना भी लाज़मी नहीं होता और दोस्त के आगे न ही किसी दिखावे की ज़रुरत पड़ती है।

इसीलिए वो अगर मंदिरों, मस्जिदों में और तुम्हारी गढ़ी पत्थर की मूर्तिओं में बसता तो मिल जाती निजात ज़िंदगी के  हर मसले से , और मिल जाती शान्ति हर बार सिर्फ अगर उसके दर्शनों से तो क्या था फिर ?

पर तुम भी जानते हो ये मुमकिन नहीं ।

इसलिए तुम्हारे बनाए आस्था के केंद्र  माध्यम हो सकते हैं उसके नज़दीक आने का, आध्यत्मिक प्रेरणा का, एकाग्रता स्थापित करने का , स्वयं से जुड़ने का या फिर आत्मा मोक्ष का। किन्तु  उसकी मूरत के आगे झुक कर, उसके ‘सदैव सर्वोपरि’ होने पर हार बार स्टाम्प लगाना इतना ज़रूरी क्यों है , जबकि तुम अपने होने का बुनयादी कर्तव्य भी ठीक से अदा नहीं कर पाते ।

इसीलिए  मैं उसे पत्थरों में नहीं ढूंढ़ती।

क्योंकि मैं उसे अपने चारों ओर हर ज़र्रे में महसूस कर सकती हूँ।

मुझे मंदिरों में भटकने, लम्बी कतारों  में लग कर उस पर तेल दूध और फूल अर्पित करने या हफ्ते का एक दिन चुनकर काले वस्त्र ओढ़कर तेल अर्पण करने , किसी चर्च के ‘संडे मास’, या गुरूवार के शाम दरगाह की हाज़री की ज़रूरत नहीं पड़ती। उसका आभास करने के लिए हर बार मंदिर की चौखट पार कर  घंटियाँ बजाने की आवश्यकता महसूस नहीं होती, जबकि वह सृष्टि की हर खूबसूरत और कुरूप वस्तु में वास करता है ।

सूरज की तपिश में, बादलों की चित्रकारी में,बारिश की फुहारों में और उसके उपरांत ज़मीन से उठती मीठी सी  खुशबू में , इंद्रधनुष की लुभावने रंगों में, पहाड़ों पर पड़ी बर्फ की सफ़ेद चादर में, , पेड़ों से छन कर आती भोर की किरणों में, अपने हिस्से के आसमान में टिमटिमाते तारों में, धान के लहलहाते खेतों में, नरगिस के फूलों की महक में,  पत्तों की सरसराहट में, कुम्हार की गीली मिटटी में, पियानो की मधुर धुन में ।

किसी नन्हे से बच्चे की उन्मुक्त हँसी में, किसान के माथे से सरकते पसीने में, करघे पर सूत बुनते जुलाहे की उंगलिओं में,  माँ के हाथ के बने स्वेटर में, पिता के आलिंगन में, दोस्ती के खट्टे मीठे एहसास में,  हीर रांझे के किस्सों में, कबीर के दोहों में,  बिना टैक्स लगे देखे जाने वाले सपनों में, सुकून की नींद में, ज़िंदगी की गुल्लक में जमा होने वाली बिन पैसे की खुशियों में, और  यही नहीं, मुझे वो  पतझड़ के बेरंग मौसम की उदासी में भी दिखाई देता है, पानी की इक बूँद को तरसते बेजान मरुस्थल में भी, सफ़ेद कफ़न की पाकीज़गी में , अपने यार के लिए तरसते शायर के लफ़्ज़ों में समाए दर्द में और शायद ज़िंदगी की हर जद्दोजहद में उसे ढूंढ़ती हूँ!

यहाँ मिलता है वो, यहीं बसता है वो! मेरे और तुम्हारे अंदर, तुम्हारे हर अंश में, तुम्हारे हर एहसास में, तुम्हारे सबसे करीब और वहीँ मिलता है इक अजब से सुकून!

जब अपने अंदर ही सुकून मिल जाए तो फिर उसे पत्थरों में क्यों ढूंढना ?

तुम्हारी संगिनी

 

 

मैं नही सिद्धार्थ की यशोधरा

जो सहसा चल दिए इक रात्रि

सत्य की खोज में

देकर अपनी संगिनी को वियोग की वेदना

 और छोड़ गए उसे क्षत विक्षत !

मैं नही लक्ष्मण की उर्मिला

जो स्वयं बैठ अवहेलना की वेदी पर

झेल गई बनवास की पीड़ा !

मैं नही कृष्ण की राधा

 जो करती रही संस्कारों की परिक्रमा

और रह गई प्रेम के आलिंगन से वंचित !

मैं नही एंथनी की क्लेओपेट्रा

जिसके अडिग प्रेम की अनुभूति

 राख हुई सत्ता लोभ की प्रचंड अग्नि में

मैं उस सैनिक की अर्धांगिनी भी नही

जो टकटकी लगाए निरंतर

 राह देखती है उसके घर लौट आने की

उसकी अनुपस्थिति में

धैर्य की जलती बुझती मशाल थामे

प्रतीक्षालय बन

समय की छन्नी से पाए

 प्यार के अनुपात का रखती है लेखा जोखा

मैं नही कर सकती मरुस्थल बन

 प्रेम रुपी वर्षा की फुहारों का इंतज़ार

मुझे नही धूप के बाद

छाओं के लंबे अंतराल की लालसा

विवशताओं से बाध्य होकर

मुझे नही समेटनी अपनी आकांक्षाएं

नही चाहती तुम बन जाओ मेरी स्मृतियों का हिस्सा

क्योंकि तुम

मेरी अंतरात्मा की अभिव्यक्ति हो

तुमने ही दी है

मेरे मन की उड़ान को संतुष्टि की धरा

मुझे केवल

प्रेम की अविरल धारा में ओत प्रोत बहना है

मुझे केवल

 तुम्हारी संगिनी बन रहना है

तुम्हारी संगिनी बन रहना है!

 

होगी उन्हें मंज़िलों की तलाश

 

 

 

 

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होगी उन्हें मंज़िलों की तलाश

हमें तो सफर की तपिश में भी सुकूँ मिलता है

न हो मयस्सर आतिश ग़र आफताब की

हमारे हौसलों का काफिला अंधेरों में भी बदस्तूर चलता है

 

नाक़ामियाँ भी मेरी  मुझे बहुत अज़ीज़ हैं

के इनके रहते कामयाबी का गुरूर मेरी फितरत से कोसों दूर रहता है

 

उस दरिया का मुकद्दर तो देखिये हुज़ूर

जो खोकर अपना वजूद रोज़ किसी समंदर में जा मिलता है

 

है मेरे इश्क़ में अजब सी इक शिद्दत

के हर बार उसके चेहरे में मुझे खुदा का ही अक्स दिखता है

 

ये और बात है दरम्यान फासला गहरा हो चला है

कोई है जो आज भी तेरे लौट आने का भरम रखता है

 

कर लो लाख कोशिशें तुम उसे भुलाने की

जो रूह तक समाया हो उससे जुदा होने में वक़्त तो लगता है

 

होगी उन्हें मंज़िलों की तलाश

हमें तो सफर की तपिश में भी सुकूँ मिलता है

न हो मयस्सर आतिश ग़र आफताब की

हमारे हौसलों का काफिला अंधेरों में भी बदस्तूर चलता है  

 

 

मेरा शहर

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जब भी इस शहर को देखता हूँ मैं 
इस मिट्टी से किस कदर जुड़ा हूँ 
बस यही सोचता हूँ मैं

कहीं कुछ कमी सी है
इसलिए थोड़ा सा सुकुं ढूँढता हूँ मैं

मेरे बचपन की यादों में

बिन आँगन खेले खेलों में

शहर की तंग सड़कों में

स्कूल बस के लम्बे इंतजार में

संडे की प्रतिक्षा में 

माल रोड जाकर

एक आईसक्रीम की चाह में

पहाडों पर रेंगती धुंध में

 जीवन अस्त व्यस्त करती बरसात में 
सर्दी वाले कपडों के लगे अम्बार में

थोड़ी उमीद लगाऐ

धूप की तलब में

देवदार की छाओं में

जाड़े की बार्फीली हवाओं में 

ऊँचे नीचे रास्तों की थकान में

दो कमरो के छोटे से मकान में

छोटे शहर की सादगी में 

ज़रूर्तों की छोटी सी ‘लिस्ट’ में

संतुष्टी के बड़े ‘लिफाफों’ में

जो कहीं खो सी गई है 
उस सरल जीवन की छवि खोजता हूँ मैं !

जब भी इस शहर को देखता हूँ मैं 
इस मिट्टी से फिर कब जुड़ पाऊँगा 
ना जाने कब लौट पाऊँगा

बस यही सोचता हूँ मैं !

ये ‘देवी की उपाधि’ किसलिए ??

 

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प्राथर्ना, पूजा ,अनुष्ठान,

 चुनरी, चूड़ियां , बिंदी , लाली

मंदिरों में लम्बी कतारें

चढ़ावे और दिखावे का अम्बार

और ओवरटाइम करती

अम्बा, काली , दुर्गा, ‘देवी माँ’

या फिर जिस किसी नाम से भी

आप उनका गुणगान करते हों !

 

सब कुछ तो है यहाँ

भक्ति के इस ‘फुली कसुमराइज़्ड ‘ बाज़ार में

आस्था का जैसे कोई सालाना स्वांग

 

पाओं धोकर आरती उतारेंगे

माथे पर टीका, कलाई पर लाल धागा

और थमा देंगे कुछ सिक्के, नोट और चंद तोहफे !

 

साल के कुछ दिन चुनते हैं

उसे सर आँखों पर बिठाने के लिए

और जारी रहता है 365 दिन वही तमाशा

 

अलग अलग तरीकों से करते हैं उसका तिरस्कार

कभी नोच खाते हैं

किसी भूखे गिद्ध की तरह उसके जिस्म को

सड़क, चौराहे, कार, दुकानदफ्तर

या अपने ही घर में

तीन, पांच, आठ, दस,

बारह, सोलह,  बीस या अस्सी

उम्र का लिहाज़ अब नहीं होता !

 

आदेश, उपदेश , नसीहतें भी उसी की झोली में

और अगर आने लगे

उसके ख्यालों से बगावत की बू

तो फिर

धमकी, फरमान, फतवे

चाकू, तलवार, गोली या गाली

और पुरुष मात्र होने का अभिमान काफी है

दिखाने के लिए उसे

उसकी असली ‘ औकात’

ताकि हमेशा डरी रहे

और बिना किसी चूं चपट के करती रहे

संस्कारों की नियम बद्ध परिक्रमा

कर दे आत्मसमर्पण

और रख दे हमेशा के लिए

अपनी इच्छा, आवाज़ , अंतरमन

सब मसलकर तुम्हारे तलवों तले !

 

और जब कर डालते हो

उसकी अस्मिता के चिथड़े

तो मिलती हैं उसे बदले में

अखबारों की सुर्खियां, कुछ आंकड़े ,

कानून में संशोधन, योजनाएं, 

सहायता राशि, आश्वासन और साहनुभूति

लेकिन बुनयादी सोच को बदलने का जज़्बा

किसी बंजर और बेजान ज़मीन के टुकड़े जैसा !

 

फिर ये ‘देवी की उपाधि’

किस काम की ?

क्यों ज़रूरी है ये ढोंग ?

जब तुम दे नहीं सकते उसे

अभिव्यक्ति की आज़ादी और

फैसले लेने का अधिकार

क्योंकि मानसिकता नहीं बदलती

मूर्तिओं के समक्ष नतमस्तक होने से

उपवास और आडम्बर से !

 

तो फिर आप ही तय करिए

ऐसे में कितनी शुभ और सार्थक है

देवी की ये आराधना

 

ऐसे में शायद नहीं दे पाऊँगी आपको

ऐसे किसी पर्व की शुभकामना

शायद नहीं कह पाऊं

शुभ नवरात्रि !

 

इक आवाज़ उठी थी बगावत की

 

rebel writers

इक आवाज़ उठी थी बगावत की

दबा दी गई

ये कलम की तासीर का खौफ था

के आज फिर किसी अदीब की हस्ती मिटा दी गई

 

मुमकिन है  जल रहा था

हवाओं के खिलाफ

वो चिराग

जिसकी लौ कल बुझा दी गई

 

कह दो उनसे के हम नहीं डरते

फ़ना हो जाने के ख्याल से

रौशन हो उठेंगी हज़ारों मशालें

क्या हुआ इक शम्मा

गर बुझा दी गई

 

ये इन्कलाबों की बस्ती है

यहाँ मौत का मातम नहीं होता

कट भी गए सर तो क्या

सोचेंगे इबादत में उसकी

एक और रस्म निभा दी गई

 

जारी रहे कोशिशों का कारवां

कायम रहे जज़्बों की तिश्नगी

फिर से कहीं न बिखरने पाए

वो हौसलों की दीवार जो कल गिरा दी गई

 

इक आवाज़ उठी थी बगावत की

दबा दी गई

ये कलम की तासीर का खौफ था

के आज फिर किसी अदीब की हस्ती मिटा दी गई